मंथन (कविता) – चन्दन कुमार मिश्रा

(मंथन)
दर दर मैं यूँ फिरता हूँ
गिरके फिर सम्भलता हूँ
किसी के उठाने की मैं क्यों आस करूँ
समझ में नहीं आता किस पे विश्वास करूँ।

कोई कहता हम हिन्दू हैं
कोई कहता है हम मुस्लिम हैं
समझ नहीं आता
क़ुरान की तालीम लूँ या
गीता का पाठ करूँ ।
समझ नहीं आता किसपे विश्वास करूँ ।।

किसे पता की मैंने बचपन को खोया
बिना राम बिना रहीम के मैं कितना रोया
वो कह रहें की भुला दो उन यादों को
जला दो इन्हें नफरत की ज्वालामुखी में
समझ नहीं आता
कहाँ से मैं प्रयास करूँ
समझ नहीं आता किस पे विश्वास करूँ ।।

अँधेरा ही अँधेरा है
जैसे लगता है यहाँ सिर्फ गिद्धों का बसेरा है
नोच रहे हैं एक दूसरे को
घोट रहें हैं गला एक दूसरे का।
खुली आँखों से देखकर भला कैसे मैं हर्षो उल्लास करूँ
समझ नहीं आता मैं किसपे विश्वास करूँ
समझ नहीं आता मैं किसपे विश्वास करूँ।।

Name: Chandan Kumar Mishra
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