बेटियां (कविता) – अमित कुमार तिवारी

आंगन में किलकारियॉ लगाके दौड़े
नन्हें कदम बढाती तुम
आज तेरी विदाई के बाद
यादें तेरी बहोत आती हैं     1

कल तक खेला था बचपन
मेरे घर को किया पावन
पलों में पलकें छलकीं
खुशी के अश्क बहते हैं 2

तिरंगे को हिमालय की चोटी में
फहराके
मॉ बाप के नाम को
बेटियां आगे बढ़ाती हैं  3

धन्य हैं मॉयें वो जिन्होनें जन्मी हैं बेटी
तुलसी की तरह मीठी कुलदीपिका कहलाती हैं   4

कभी महिषी के रूप में पापियों को संहारती है
कभी गंगा के रूप में धरा तार  जाती हैं    5  

घरौंदे की माटी को  सहेजती हैं
संवारती हैं
मॉ,बहन,बहू,बेटी,मित्र का फर्ज
बेटियां बखूबी निभाती हैं ।।

WRITTEN BY – AMIT KUMAR TIWARI (Aapka Amit)
E MAIL – amitapkamitra@gmail.com

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