प्यास का मौसम (कविता) – उमेश धरमराज

प्यास का मौसम

यादें जगा रहा हैं बरसात का मौसम

आया हैं लौट के फीर प्यास का मौसम.

ए काश के मुझको अभी होश ना होता

या फिर तक़दिर में दोष ना होता.

अमृत क्यों ना बरसे रातों में तेरे बिन

या आजाए रवानी सांसों में तेरे बिन.

फिर भी क्या लौट पाएगा आस का मौसम?

आया हैं लौट के फीर प्यास का मौसम….

भीगी हुई फिज़ा में वो बात अब कहां

उस मौसम के जैसे दिन रात अब कहां.

पानी के बदले अग्नि दुखीयों पे आ पडी

शायद तेरे जहान में खुशियों की हैं झडी.

लौटा दे एक बार तेरे पास का मौसम

आया हैं लौट के फीर प्यास का मौसम….

गिरती हैं बिजलियां मेरे दिल पे क्यों सदा?

या आती हैं बार-बार यादों में क्यों अदा?

हो जाए जिवन की बरसात आखरी

निकले तो निकल जाए बारात आखरी.

तडपाए यांदों की बारात का मौसम

आया हैं लौट के फीर प्यास का मौसम….

 

– उमेश धरमराज.

umesh.dharamraj@gmail.com

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