पहचान … (ग़ज़ल) – UE विजय शर्मा

पहचान …

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खुदायी सा प्यारा साथ है यह साथ हमारा तुम्हारा

बन मुस्कान साथ चलता है यह साथ हमारा तुम्हारा

किसी मंज़िल की तलाश नही है मेरे मन को हमारी

राह-ए-ज़िन्दगी पर मेरी नजरों को तलाश रहेगी तुम्हारी

अरमान तो कभी भी ना थे मेरे ख्याली और आस्मानी

मन से मन की बाँध डोर तुझसे हुआ है इश्क रूमानी

तन से तन ना मिल पाए तो कभी शिकायत ना करना

अपने मन से मेरे मन की सोचों को कभी दूर ना करना

नही जानता क्या रिश्ता है रूह से रूह का मेरा तुम्हारा

जो भी है यह है पूरा जो दिखता अधूरा सा रिश्ता हमारा

तन के रिश्ते ना हमारे इश्क की कभी पहचान बनेंगे

कर रूहों का मिलन हम मोहब्बत की पहचान बनेंगे

…… यूई

Contribution from: UE Vijay Sharma
Email: cmd.nvm@gmail.com
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