दो किनारों की दास्ताँ (कविता) – आशुतोष तिवारी

दो किनारों की दास्ताँ

सुनो, तुम्हे दो किनारो की, एक दास्ताँ सुनाता हूँ।

उम्र से पहले जो ढल गया, किस्सों से भी आगे निकल गया

तेज ख़ामोशी का दरिया, जिन दो किनारों को निगल गया।

एक किनारा, आज नदी के बीच से, चुपचाप पुकारता हैं।

नम रेतों के फासले पर, दूसरा, बिना सुने मुस्कराता है।

वही एक, चांदनी रात में, चाँद को अपने हाथो से नहलाता है,

एक लहर पर परछाई रख, तारो में लिपटा चाँद बढ़ाता है।

शायद उस चाँद को देख दूसरे की चंचलता वापस आ जाए,

उलझती बुनती कहानियों में, कोई शब्द, होठो पर आ जाए।

बुझी हँसी भी पूरी नहीं होती, कोई कश्ती सतह से गुजर जाती है,

मोतियाँ गोद में छुपा लेती है, पर एक सीप, उस एक को मिल जाती है।

कई सालो का इतिहास, एक पल मे, गुज़रे पल का हो जाता है,

अचानक तूफ़ान, शांत नदी के, सीने से उबल पड़ता है

दूर थे पर एक रिश्ता तो था, यही आज किनारों को बतलाता है,

दर्द फासले का नहीं, गुमनामी का है, अपनी जिंदगी सुनाता है।

कल रात डूबते वक़्त मिल गया था, वहीँ किनारा मुझको,

अपने हाथो की उँगलियों से, दोनों को मिलाने की कोशिश करता हूँ।

सुनो, तुम्हे दो किनारो की एक दास्ताँ सुनाता हूँ।

आशुतोष तिवारी
ashu774@gmail.com

 

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