तज़करा तेरी जुदाई का मगर होता है (ग़ज़ल) – सय्यद निसार अहमद

ग़ज़ल

तज़करा तेरी जुदाई का मगर होता है

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जब कभी मेरे तख़य्युल का सफ़र होता है !

ऐसा क्यों है तेरे कूचे से गुज़र होता है !!

जब तेरा रूप मेरे पेश-ए-नज़र होता है !

मेरे अश्कों में मेरा खून-ए-जिगर होता है !!

जाने कितना भी चलूँ दूर तेरी यादों से !

तज़करा तेरी जुदाई का मगर होता है !!

वक़्त के हम भी तक़ाज़ों को पढ़े हैं यारो !

क्या कभी वक़्त की आँखों में भी तर होता है?

हाँ ‘निसार’ अश्क बहाना है नवा-ए-फ़ितरत !

ज़ब्त करना भी तो अंदाज़-ए-हुनर होता है !!

सय्यद निसार अहमद
ahmadnisarsayeedi@yahoo.co.in

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