तेरी कमी (कविता) – जय शंकर झा

तेरी कमी

इन् हवाओ में आज एक कमी सी लगी

फिर से वो मेरे बदन का पसीना पोंछकर तो गुजरा

फूलो की खुशबू

धुप की मासुमियत

मौसम की मदमस्ती

यु तो पहले ही सा था सब नजारा;

 

मगर आज!

हवा का अल्हड़पन भी कुछ अजीब से उफान पे था

किसी अंजान सी एक ख्वाहिश ने

मेरे अंत:मन में एक दरार सी पैदा कर दी

 

किसी की भोली सूरत

किसी की मासूम चाहत

मन को बहुत सताने लगी

और किसी एक के बिना हर एक में कमी सी लगी.

जय शंकर झा

लेखक, कवि और गीतकार

लेखक, कवि और गीतकार

Contribution from: Jay Shankar Jha
Email: jasjhadbg@gmail.com

 

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