तमाशा एक अनोखी फिल्‍म – पंकज सुबीर की समीक्षा

तमाशा एक अनोखी फिल्‍म
– पंकज सुबीर

तमाशा देखी और देखने के बाद लगा कि इस फिल्‍म पर कुछ लिखा जाना चाहिये । यदि तमाशा जैसी कोई घटना होती है तो उस पर चर्चा करना आवश्‍यक है। प्रारंभ में ही ‘एस्ट्रिक्‍स इन कोर्सिका’ का जिक्र मानो सीधे बचपन में ले जाता है। बचपन में पढ़ी कॉमिक्‍स ‘एस्ट्रिक्‍स और कढ़ाहे का रहस्‍य’ एस्ट्रिक्‍स ओलंपिक में’ की याद ताज़ा हो गई। उसके ठीक बाद एक अद्भुत सा गाना ‘मटरगश्‍ती’ अपनी लाजवाब धुन, उससे भी लाजवाब शब्‍दों और उससे भी लाजवाब प्रस्‍तुतिकरण तथा डांस के चलते मानो टोना सा मार देता है। बहुत दिनों बाद कोई गाना ऐसा जिसका फिल्‍म की गति में बाधा बनते हुए कतई नहीं देखा। एकदम कहानी के साथ बहता हुआ। उस पर जिंदगी ऐसी की तैसी जैसे टुकड़े तो जानलेवा टाइप के सिद्ध हो रहे थे। एक अजीब से डांस को इतना खूबी के साथ दीपिका और रणबीर ने निभाया कि आनंद आ गया।मटरगश्‍ती बहुत दिनों बाद कोई ऐसा गीत है जिसमें शब्‍द, संगीत, डांस, अभिनय, पिक्‍चराइज़ेशन, सब कुछ कमाल का है। पहले हिस्‍से में आए पियूष मिश्रा कुछ प्रभावी नहीं लगे ( दूसरे हिस्‍से में कमाल कर गए यह अलग बात है) । यह कहानी पूरी तरह से दो ही लोगों की थी। और फिल्‍म में कहीं कोई तीसरा कलाकार नहीं है ( नहीं है का मतलब महत्‍त्‍वपूर्ण नहीं है) । बस यह दोनों ही फिल्‍म को अपने कंधे पर लेकर चलते हैं। इंटरवल के पहले की फिल्‍म का पहला हाफ बहुत शानदार है लेकिन इंटरवल के पहले का दूसरा हाफ कुछ कमजोर और उलझाऊ सा बन गया है। और शायद यही इस फिल्‍म की कमजोरी साबित होगा। धारणाओं से विपरीत इंटरवल के बाद फिल्‍म एक बार फिर अपनी गति पकड़ लेती है। और इस गति को पकड़ाने में रणबीर और दीपिका की शानदार अदाकारी को ही पूरा श्रेय जाता है। यह फिल्‍म थ्री इडियट्स के कुछ पात्रों का शेड लिये हुए है। बचपन को बहुत खूबी से डिफाइन किया गया है। इंटरवल के बाद एक दो स्‍थानों पर फिल्‍म बहुत ऊंचाइयों पर पहुँच जाती है। रणबीर कमाल पर कमाल करते हैं । और दूसरे हिस्‍से में ही पियूष मिश्रा आकर पहले हिस्‍से की कमजोरी को पूरी ताकत के साथ मिटा जाते हैं। छोटा सा मगर बहुत ही प्रभावशाली सीन है वह। यह फिल्‍म संवेदनशील दर्शक की मांग करती है। और शायद इसीलिये यह फिल्‍म शायद उतनी बड़ी हिट साबित नहीं हो। इस फिल्‍म के इंटरवल के बाद के कुछ दृश्‍य रुला देते हैं। इम्तियाज़ अली अपनी पिछली फिल्‍मों से आगे निकले हैं इसमें कोई शक नहीं है । हां यदि इंटरवल के ठीक पहले का आधा घंटा कुछ और अलग तरह का होता तो फिल्‍म अधिक कसी हुई होती। रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण ने कमाल किया है । फिल्‍म एक पाइंट पर आकर मनोवैज्ञानिक स्‍तर पर कुछ प्रयोग करती है, शायद यहां पर आम भारतीय दर्शक असहज हो जाएगा, समझने की कोशिश करेगा कि यह क्‍या हो रहा है। यदि इम्तियाज अली इससे और कठिन आगे की फिल्‍मों में होते हैं तो उनके लिये मुश्किल होगी। यह फिल्‍म भी कुछ कठिन तो है ही। तमाशा, अपने से पूर्व हिट हो चुके कई सारे तमाशों से कहीं कहीं बेहतर है। तमाशा का दुर्भाग्‍य है कि इन दिनों तमाशे हिट होते हैं और तमाशा, तमाशा नहीं है। वह लोग जो आज भी अपने मन में बचपन की यादों की पोटलियां रखे हुए हैं उनके लिये तमाशा एक जरूर देखने योग्‍य फिल्‍म है।

पंकज कुमार पुरोहित (पंकज सुबीर)
subeerin@gmail.com

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