जात ना पूछो लेखक की (लेख) – सुनील सालगिया

जात ना पूछो लेखक की 

आम तौर पर लेखक की कोई जात नहीं होती। वो सिर्फ़ लेखक होता है । लेखक पर किसी संप्रदाय , धर्म या जाति विशेष का हक भी नहीं होता। मुन्शी प्रेमचन्द ‘ईदगाह’ लिखते हैं , तो डॉ. राही मासूम रज़ा – टी वी सीरियल ‘महाभारत’ । लेखक की क़लम किसी धर्म या जाति में बंधती नहीं। वो तो बस लिखता है, डॉ. रज़ा की मानिंद , जिन्होंने अपनी कविता ‘गंगा और महादेव ‘ में लिखा …

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है 

मुझको क़त्ल कर दो और मेरे घर में आग लगा दो 

लेकिन मेरी रग रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है 

मेरे लहू से चुल्लू भर कर 

महादेव के मुँह पर फेंको 

और उस जोगी से ये कह दो 

महादेव अपनी गंगा को वापस ले लो 

ये हम ज़लील तुर्कों के बदन में 

गाढ़ा गर्म लहू बन बन के दौड़ रही है  

लेखक किसी धर्म या जाति का नहीं होता । लेकिन लेखक का अपना धर्म ज़रूर होता है । वो है लिखना । बेबाक लिखना।

उसकी अपनी जाति भी होती है , जो तय होती है उसके विषय चयन से । जैसे प्रेम कथा लेखक, रहस्य कथा लेखक इत्यादि ।  लेखक की जाति भी उसके विषय चयन के साथ बदलती रहती है। प्रेम कथा लेखक रहस्य कथा लेखक बन सकता है।

आम तौर पर लेखक बंधना नहीं चाह्ता । वो तो बांधना चाह्ता है, अपने मानस पटल पर उभरते विचारों को – शब्दों में । लेकिन व्यवस्था, या कहें , वो सत्ता जो उसके लेखन को बाज़ार तक लाती है , वो उसे बांधना चाह्ती है। उपन्यास के लेखक को पब्लिशर बांधना चाह्ता है। फ़िल्म लेखक को निर्माता , निर्देशक के निर्धारित दायरे में बंधना होता है। और यदि फ़िल्म में कोई बड़ा स्टार हो , तो स्टार की शर्तों पर । टी वी के लेखक का तो और भी बुरा हाल है। वो चैनल की टी आर पी के मीटर को देख कर लिखता है। अक्सर वो वही लिख रहा होता है जिसके लिये उसका मन हामी नहीं भरता । लेकिन पेट भी तो भरना है। पेट के आगे मन हार जाता है। इन्हीं दायरों के बीच उसे अच्छा लिखना होता है । अपने लेखक धर्म का निर्वाह करना होता है। लेकिन सवाल ये है कि अच्छा लेखन किया कैसे जाता है।

जिन दिनों मैंने लिखना शुरु ही किया था , एक बड़े लेखक से मैंने सवाल किया था कि अच्छा लेखक बनने के लिये क्या करना चाहिये । बड़े सरल शब्दों में उन्होंने जवाब दिया था “अच्छा सोचना शुरु कर दो , अच्छा लिखने लगोगे “। बात मेरी समझ में आई नहीं । मेरे चेहरे पर लिखी नासमझी को पढ़ लिया उन्होंने । मुस्कुरा कर मुझसे पूछा ‘क्या लिखते हो’।

मैंने कहा ‘लिखने की कोशिश कर रहा हूं , कहानियां , लेख आदि। लेकिन भाषा , शैली कैसी होनी चाहिये , यदि आप कुछ टिप्स दे सकें तो …

मेरी बात को बीच में ही काटकर उन्होंने कहा ,  ‘यदि भाषा और शैली ही लिखने का मापदण्ड होती , तो भाषा पढ़ाने वाला हर शिक्षक लेखक होता ।  कहानी लिखते हो ना , लिखो । जो दिल में आये लिखो , पर लिखो , हर दिन लिखो , नियमित लिखो । बस इतना समझ कर लिखो , कहानी वही अच्छी है , जो कुछ अच्छा कहती हो । अच्छा कहना सीख लोगे , तो अच्छे ढंग से कहना भी आ जायेगा ।

अब जब भी लिखने बैठता हूँ , उनके शब्द कानों में गूंजते हैं – ‘कहानी वही अच्छी है , जो कुछ अच्छा कहती हो’ ।

लेकिन फ़िर सवाल उठता है कि क्या वो निर्माता , निर्देशक की नज़र में भी अच्छी हो पायेगी । क्या वो चैनल की मार्केटिंग टीम की नज़र में भी अच्छी हो पायेगी ।

मन में उठते सवालों के सैलाब में जवाब मिलता है – लेखक जात हो , लिखो ।  अपने लेखक धर्म का निर्वाह करो , लिखो । अच्छा या बुरा , उन्हें समझने दो ।

sunilsalgia

 

 

 

 

लेखकसुनील सालगिया
sunilsalgia@rediffmail.com

(टीवी और फिल्म लेखक)

 

 

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