ज़िन्दगी तू (कविता) – Yashu Gaur

तेरी मनमानी अदाओं को समझ नहीं पाता हूँ
ज़िन्दगी तू देती कुछ है मैं कुछ और चाहता हूँ
तोड़ कर मरोड़ कर ख़्वाहिशों के परों को रोज़ ही
पैरों में रौंद ख़्वाबों को मैं जिम्मेदारियां निभाता हूँ
ज़िन्दगी तू देती कुछ है मैं कुछ और चाहता हूँ
क़तरा-क़तरा जोड़ के बनाए ये आशियां मैंने
उड़ने को आतुर मैं इन्हीं मे खुद को कैद पाता हूँ
ज़िन्दगी तू देती कुछ है मैं कुछ और चाहता हूँ
प्यार का व्यापार कर के देखा भी तो क्या पाया
दिलों की सौदेबाजी में नफा दर्द का पाता हूँ
ज़िन्दगी तू देती कुछ है मैं कुछ और चाहता हूँ
वक़्त की ज़ालिम लकीरें खूदबख़ुद खिंच जाती हैं
उम्र्र के निशाँ चहरे पे आइनों में पाता हूँ
ज़िन्दगी तू देती कुछ है मैं कुछ और चाहता हूँ
लौट कर नहीं आता गुज़रा लम्हा इक बार फिर
बीते पलों में क्यूँ तुझे मैं ढूँढता रह जाता हूँ
ज़िन्दगी तू देती कुछ है मैं कुछ और चाहता हूँ
क्या हुआ डूबा है जो ख़्वाहिशों का सूरज बार बार
आँधियों में हाथों तले उमीदों की लौ जलाता हूँ
ज़िन्दगी तू देती कुछ है मैं कुछ और चाहता हूँ
बेवफ़ाई करती है तू मेरी हर आरज़ू – उम्मीद से
सच्चा आशिक़ हूँ मैं भी रोज़ दिल लगाता हूँ
ज़िन्दगी तू देती कुछ है मैं कुछ और चाहता हूँ

Yashu Gaur
yashugaur@gmail.com

यशु गौर

 

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