जब चाँद छू रहा था बदन तेरा (कविता) – जय शंकर झा

जब चाँद छू  रहा था बदन तेरा

जय शंकर झा की कविता

वो इश्क़ की काली स्याही रात थी
दबी-दबी सी मेरी हर जज्बात थी
मै जल रहा था चांदनी से
बेकल बेबस मजबूर सा खड़ा

जब चाँद छू  रहा था बदन तेरा ………

तेरे उफनते आँचल हवा खीच रहे थे
नज़ारे तेरे बदन को नजरों से सींच रहे थे
मैं  मन ही मन सब पे खीझता हुआ,
कि कोई ये क्यूँ नहीं समझता
ये मेरी अस्मत है,मेरी उल्फत,
मेरा सबकुछ, मेरा सबकुछ है……..

 

फूलों की खुश्बू भी तुझे छुये तो मुझे कहाँ गवारा है
सूरज की किरणे या चाँद की चाँदनी
सबसे जलता हूँ मैं
हां तुझसे बेपनाह,
हां तुझसे बेपनाह
इबादत की तरह
मुहब्बत करता हूँ मैं
मुहब्बत करता हूँ मै………..

 

जय शंकर झा

लेखक, कवि और गीतकार

लेखक, कवि और गीतकार

jasjhadbg@gmail.com

 

 

 

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