चेहरे की चंद लकीरों ने (कविता) – शशि कान्त जुनेजा

चेहरे की चंद लकीरों ने ,लिख डाली नई कहानी.
पहले तो खोया बचपन , अब खो गई जवानी .

न कोई शिकन थी चेहरे पर ना ज़िक्र कोई,
कर डाला जो कर डाला, पर न फ़िक्र कोई.
रोज सुनाया करते थे , अपने सपनो की कहानी. चेहरे की …………….

बीच बाजार में छोटा सा, वो घर भी याद मुझे ,
घर के बहार उठता धुँआ, वोह अंगीठी याद मुझे .
वोह संध्या वो फकीरों की ,टिक टिक भरी कहानी चेहरे की चंद ……

हाँ दुनिया की नज़रों में , हम शायद इतने भोले थे,
सच ही समझा जाता था ,झूठ कभी हम बोले थे
ना भूले अपने बचपन की, कुछ बातें बरी पुरानी. चेहरे की चंद ……….

कुछ यादे तो ऐसी है , जो आज तलक भी ना भूले,
कच्चे आमों की डाली , और वो सावन के झूले.
मार के पत्थर तोड़ा करते ,इन अम्बिओं की कहानी चेहरे की चंद………

न बचपन की वोह बातें ,ना गर्मी की वोह रातें ,
दो चुस्की चाय की पीने को, घूम शहर थे आते.
हाँ छत पर बैठ इशारों की, वो लम्बी कहानी. चेहरे की चंद…………

कुछ यादें बस तस्वीरों में, ना थी शायद तक्दीरों में.
एक घुटन सी बन बैठी,बदली चाँद लकीरों में.
जाने किस पल खोया बचपन ,खोई कब थी जवानी. चेहरे की चंद….

जुनेजा शशि कांत

junejashashi@gmail.com

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