घनघोर अँधेरे हैं (कविता) – शशिकांत जुनेजा

घनघोर अँधेरे हैं … घनघोर अँधेरे हैं

बाद अंधेरों के भी तो ना रुकते सवेरे है

कोई भरम ना अखिओं का अखियाँ सोती हैं

रात ज़रूरी अखिओं को ,फिर सुबह होती है

आँख मिचोली करते हरदिन शाम सवेरे हैं

घनघोर अँधेरे हैं……..

आँख. खुली तो रोशन पाया मैंने उसका चेहरा

रात अँधेरी में आ कर के चंद किरणों ने घेरा

काली रात में ही  तो लगते चाँद के फेरे हैं

घनघोर अँधेरे हैं…..

चाँद की किरणे भीतो,शायद यूँ शर्माती हैं

एक पक्ष में खुलती हैं, गायब हो जाती हैं

रात चांदनी में ही तो दिखते, चंचल चेहरे हैं

घनघोर अँधेरे हैं…….

सूरज और चन्दा का है, कैसा ये याराना

एक ने जब जाना है, तो है दूजे ने आना

जाने कौन लगाता किसके कितने फेरे है

घनघोर अँधेरे हैं….

क्यों उलझी है सारी दुनिआ कैसे चक्कर में

बंधा हुआ है हर बन्दा,कर्मों के चक्कर में

नहीं लगाने हाँ मैंने ,लाख चौरासी फेरे हैं

घनघोर अँधेरे हैं………..

Juneja SHASHI KANT (J Sk)

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