कुछ यादें (कविता) – अब्दुल्लाह खान

कुछ यादें
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माज़ी के दरीचे से
कुछ यादें
उतर आयीं  हैं
मेरे ख्यालों के सेहन में
तबस्‍सुम से लबरेज़ यादे
 ग़म से आलूदा यादें
यादें जो पुरसुकून हैं
यादें जो बेचैन  हैं
 मेरे वॉर्डरोब  में रखे कपड़ो की महक में
लिपटीं हैं यादें
बिस्तर के चादर और तकियों की सिलवटों में
सिमटी हैं यादें
यादें चिपकी हैं
एलबम के हर पन्ने पे
यादें टंगी हैं पर्दे बनकर
हर खिड़की और दरवाज़े पे
सीलिंग फैन के हवाओं में
सरगोशियाँ  करती हैं यादें
पुरानी कॅसेट्स की उलझी हुई टेपों से
रुक रुक कर, कुछ कुछ बोलती हैं यादें
मनीप्लांट की ज़र्द होती  पत्तियों में बाक़ी हैं
यादों के निशान
किताबों के सफों  के बीच सूखे गुलाब  की पंखुडियों से होती  है
यादों की पहचान
मेरे घर में यादों के अलावा
और भी बहुत कुछ है
जैसे हर तरफ चहल कदमी करती तन्हाइयां
कोने में टूटे हुये कुर्सी पे बैठी  खलिश
दीवार पे तिरछी लटकी हुई बेक़रारी
और बरामदे मे फर्श पे लेटी  मायूसी
यहाँ पे एक नन्ही सी दर्द भी  हुआ करती थी
लेकिन वो अब काफी बड़ी हो गयी है
और उसका नाम  दवा हो गया है
हाँ…
मेरे दहलीज़ पे
दीवार से टेक लगा कर खड़ी है कोई
और सामने रहगुज़र को  तकती रहती है
वो अपना नाम उम्मीद बताती है
अब्दुल्लाह खान
abdullah71@gmail.com
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