कहां खडी है हिंदी ? – रूद्रभानु प्रताप सिंह

कहां खडी है हिंदी?
लेखक – रुद्रभानु प्रताप सिंह

‘हिंदी को डरने की जरूरत नहीं है, अंग्रेज़ी के बाद पूरे विश्व में यह सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। यह स्पेनिश और चीनी भाषा से आगे निकल गई है। पिछले ५० साल में विश्व में हिंदी भाषियों की संख्या २६ करोड़ से बढ़कर ४९ करोड़ और अंग्रेज़ी बोलने वालों की संख्या ३३ करोड़ से बढ़कर ५१ करोड़ हो गई है। हिंदी की वृद्धि दर अंग्रेज़ी से ज़्यादा है। साहित्य और बोलचाल की भाषा से आगे निकल कर हिंदी अब बाजार की भाषा बन गई है। अब अरबों रुपये के व्यवसाय का माध्यम बन गई है हिंदी।’ यह आंकड़ा पिछले दिनों एक चर्चित वेबसाइट ने प्रकाशित की। इसके बावजूद इस बात की पड़ताल करने की जरूरत है कि भूमंडलीकरण, उदारीकरण और सूचना-तकनीक के इस युग में हिंदी कहां खड़ी है?

इस बात को परखने के लिए हम दिल्ली के लोधी रोड पर स्थित एनटीपीसी के विशाल कॉरपोरेट कार्यालय पहुंचे। ऑफिस में घुसने के बाद लिफ्ट के सहारे हम तीसरे फ्लोर पर पहुंचे। वहीं बायीं तरफ राजभाषा अधिकारी का कार्यालय है। अन्य विभागों की तुलना में यहां काफी शांति थी। दो-तीन कर्मचारी बड़ी निश्चिंतता से अपने कंप्यूटर पर बैठे थे। कार्यालय के एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने हमारा परिचय पूछा। जब हमने राजभाषा अधिकारी के बारे में पूछा, तो उसने बताया कि राजभाषा अधिकारी छुट्टी पर हैं। वह कर्मचारी अभी हमें कुछ और बता ही रहा था कि हमारे साथी ने सवाल कर दिया- ‘यहां इतनी शांति क्यों है? क्या राजभाषा अधिकारी नहीं हैं, इसीलिए।’ जवाब देते समय कर्मचारी थोड़ा मुस्कुराया और बोला ‘अरे नहीं, ऐसा नहीं है। यहां हलचल तब होती है, जब हिंदी पखवारा शुरू होता है। हिंदी दिवस से लेकर पूरे पंद्रह दिन कार्यालय के सभी लोग व्यस्त रहते हैं। कोई पोस्टर छपवाने में, तो कोई कार्यक्रम की तैयारी करने में। इन दिनों मेरी व्यस्तता भी बढ़ जाती है। रोज कार्यक्रम होते हैं, कविता, कहानी, निबंध प्रतियोगिता और न जाने क्या-क्या। फिर पखवारा खत्म, तो काम भी खत्म। १४ सितंबर आने वाला है, आप लोग भी आइएगा…. देखिएगा कैसी रौनक रहती है…. वैसे यह बात मैं सिर्फ आप लोगों को बता रहा हूं, किसी और से मत कहिएगा।’ ‘पक्का किसी से नहीं कहेंगे।’ यह कह कर हमलोग वहां से निकल गए। धीरे-धीरे हमलोग मेट्रो की तरफ बढ़े। दोपहर का समय था, शायद इसी वजह से मेट्रो में भीड़ नहीं थी। सीट पर बैठे और बगल वाले से बतियाना शुरू कर दिया। संयोग से उसकी समस्या और हमारी पड़ताल की दिशा एक ही निकली। उसका नाम था मनोज। स्नातकोत्तर करने के बाद वह नौकरी की तालाश में है, मगर अंग्रेजी उसके लिए मुसीबत बन गई है। उसने बताया कि आज एक नौकरी के लिए उसका साक्षात्कार था। साक्षात्कार में सब कुछ तो ठीक था, मगर मुझे सिर्फ इस अधार पर अयोग्य करार दे दिया गया कि मैं अंग्रेजी ठीक से नहीं बोल पाता। वे बोले कि मेरी अंग्रेजी की समझ ठीक नहीं हैं, इसलिए मैं ठीक ढंग से काम नहीं कर पाऊंगा। यही नहीं, बैंक, एसएससी, यूपीएससी हर परीक्षा का यही हाल है। सब में अंग्रेजी अनिवार्य है। हिंदी के नाम पर लोग बड़ी-बड़ी बातें भले कर लें, लेकिन देश में इसकी क्या औकात है, यह बताने की जरूरत नहीं है। ‘मैंने हिंदी माध्यम से पढ़ाई करके बहुत बड़ी गलती कर दी।’

मनोज के बाद हमारी मुलाकात सचिन से हुई। बिहार के रहने वाले सचिन हिंदी माध्यम से सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सचिन ने बताया कि हिंदी माध्यम से तैयारी करना आसान नहीं है। अंग्रेजी माध्यम वालों की तुलना में हमें पाठ्य-सामग्री को लेकर खासी परेशानी होती है। हिंदी में वह सामग्री नहीं मिल पाती, जो अंग्रेजी में उपलब्ध है। सिर्फ किताबें ही नहीं, हिंदी माध्यम में शिक्षकों की भी कमी है। ऊपर से सरकार की नीति ऐसी है कि उसका शिकार भी हिंदी माध्यम वाले ही हो रहे हैं। पिछले पांच सालों के यूपीएससी के रिजल्ट पर यदि नजर डालें, तब पता चलता है कि हिंदी माध्यम से परीक्षा देने वालों के पास प्रतिशत में कितनी जबरदस्त गिरावट आई है। इसके बाद हमारी मुलाकात न्यायालयों में हिंदी में सुनवाई के लिए आंदोलन कर रहे श्याम रुद्रपाठक से हुई। अभी कुछ दिन पहले ही वह जेल से रिहा हुए हैं। कहां खड़ी है हिंदी? इस प्रश्न के जवाब में पहले वह गंभीर हो गए, फिर कहा कि जब देश में अपनी भाषा में न्याय मिलना ही मुश्किल है, तो फिर इस प्रश्न का क्या उत्तर दिया जाए कि हिंदी कहां खड़ी है? हिंदी सिर्फ गरीबों की भाषा है। देश का शासक वर्ग तो अंग्रेजीयत मानसिकता में जीता है। न्यायालयों में जब न्यायाधीश फैसला सुनाते हैं, तो सामान्य वादी और प्रतिवादी यह समझ ही नहीं पाते कि फैसला उनके पक्ष में आया है या विपक्ष में। पूरी न्यायिक प्रक्रिया अंग्रेजी में होती है, जो आम आदमी की समझ से परे है। वकील ही लोगों को समझाते हैं कि आप मुकदमा जीत गए या हार गए। देश में सिर्फ दो से तीन फीसदी लोग ही अंग्रेजी बोल और समझ पाते हैं, फिर भी हिंदी के साथ इस तरह का व्यवहार समझ से परे है।

आईटीओ में चाय की एक दुकान पर केंद्रीय विद्यालय के पूर्व प्रधानाचार्य डॉ. मदनमोहन मिश्र से जब यह प्रश्न किया कि हिंदी कहां खड़ी है, तो वह भड़क गए और बोले, ‘आप लोग हिंदी दिवस पर हिंदी की आरती उतारते हैं और तिलक अंग्रेजी के माथे पर लगाते हैं। संयुक्त राष्ट्र में हिंदी हमारी नाक होती है और स्वराष्ट्र में उसी नाक को हम अंग्रेजी के जूतों पर रगड़ते रहते हैं। राजभाषा के साथ जैसा छल-कपट भारत में होता है, वैसा दुनिया के किसी भी देश में, किसी भी भाषा के साथ नहीं होता। उसका ओहदा महारानी का है और काम वह नौकरानी का करती है। दुर्योधन के दरबार में उसे द्रौपदी की तरह घसीटा जाता है और भारत के बड़े-बड़े योद्धा – जनवादी कॉमरेड, लोहियावादी नेतागण, संघी संचालकगण, भाजपा के हिंदीवीरों, गांधी की माला जपने वाले कांग्रेसियों और सर्वोदयियों तथा दयानंद के शिष्यों- सभी के मुंह पर ताले लगे रहते हैं। वे बगलें झांकते हैं और खीसें निपोरते हैं। मैं अंग्रेजी का विरोधी नहीं हूं। किसी भाषा या साहित्य से कोई मूर्ख ही नफरत कर सकता है। कोई स्वेच्छा से कोई विदेशी भाषा पढ़े, बोले, लिखे, इसमें क्या बुराई है? जो जितनी अधिक भाषाएं जानेगा, उसके लिए संपर्कों, सूचनाओं, अनुभूतियों और अभिव्यक्तियों की उतनी ही अधिक खिड़कयां खुलेंगी, लेकिन भारत में कुछ अजीब-सा खेल चल रहा है। स्वदेशी भाषाओं और बोलियों के सारे दरवाजे बंद किए जा रहे हैं और विदेशी भाषाओं की सारी खिड़कियां खोली जा रहीं हैं। इस खिड़की का नाम अंग्रेजी है। अगर आप अंग्रेजी नहीं जानते तो कुछ नहीं जानते हैं।’

इनकी बातों के अलावा दूसरा पहलू भी है। हिंदी पर भारत की ३५ लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था का आधा हिस्सा टिका हुआ है। यानी अर्थव्यवस्था का आधा भाग हिंदी भाषी क्षेत्र में है। इतना ही नहीं, २९ हजार करोड़ का टीवी कारोबार भी इसी भाषा पर टिका है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब तो अंग्रेजी चैनल भी हिंदी के विज्ञापन दिखाने लगे हैं और बीबीसी, स्टार, सोनी, एम टीवी, डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्राफी, हिस्ट्री जैसे अनेक चैनलों ने हिंदी में अपने प्रसारण आरंभ कर दिए हैं। भारत जैसे देश में जहां पढ़े-लिखों की संख्या सिर्फ ४८ करोड़ है, वहां १८ करोड़ लोग रोजाना हिंदी का अखबार खरीदते हैं। दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री भी हमारे यहां हैं, जहां सालाना ६०० नई फिल्में बनतीं हैं। इनमें हिंदी की लगभग १५० फिल्में शामिल हैं, जिससे हजारों करोड़ रुपये का कारोबार होता है। बदलते परिवेश में हिंदी ने भी अपने स्वरूप को परिवर्तित किया है। इंटरनेट पर हिंदी की बेबसाइटों में बढ़ोत्तरी हो रही है। इंटरनेट पर हिंदी में कार्य-संस्कृति का विकास लगातार जारी है। हिंदी में लिखने के लिए सी-डैक ने नि:शुल्क सॉफ्टवेयर जारी किया है, जिसमें अनेक सुविधाएं उपलब्ध हैं। माइक्रोसॉफ्ट ने ऑफिस हिंदी के जरिए भारतीयों के लिए कंप्यूटर का प्रयोग आसान कर दिया है। आईबीएम द्बारा विकसित सॉफ्टवेयर में हिंदी भाषा के ६५,००० शब्दों को पहचानने की क्षमता है। इंटरनेट पर ५०,००० से भी ज्यादा हिंदी ब्लॉग हैं। गूगल से हिंदी में जानकारियां धड़ल्ले से खोजी जा रही हैं। हिंदी यूनीकोड के विकास ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर हिंदी लिखना आसान बनाया है। आगे भी यह विकास लगातार जारी है। मगर सवाल अब भी वही है कि इन सब के बीच कहां खड़ी है हिंदी?

लेखक - पत्रकार

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