एक रोज़ (ग़ज़ल) – उमेश धरमराज

एक रोज़…

मिल गए थे राह में वो दफ्अतन

चढ गया नशा लगी उनकी लगन.

वो थे आगे और हम पिछे चले

देखा दुनिया ने मेरा दिवानापन.

चढ गया नशा लगी उनकी लगन…

देखना उनका अदा से बारहा

इश्क़ का रोका नहीं गया उफन.

चढ गया नशा लगी उनकी लगन…

गेसुओं की आड में वो हुस्न था

खुश्बु का लिबास पहने था बदन.

चढ गया नशा लगी उनकी लगन…

शाम की ठंडी हवा को लू लगी

ज़र्रे ज़र्रे में सिमट आई तपन.

चढ गया नशा लगी उनकी लगन…

जंग परस्तो देख लो एकबार तुम

दावा हैं दुनिया में छा जाए अमन.

चढ गया नशा लगी उनकी लगन…

हो जाए बादे क़ज़ा जन्नत नसिब

ओढनी उनकी जो बनजाए क़फ़न.

चढ गया नशा लगी उनकी लगन…

हाय कैसी हैं ये हम पे धुन सवार

फुल दिल को दे गया मिठी चुभन.

चढ गया नशा लगी उनकी लगन…

हुस्ने बे-पनाह पे कहते हो ‘उमेश’

कह ना पाए हो किए लाखो जतन.

चढ गया नशा लगी उनकी लगन…

– उमेश धरमराज.

umesh.dharamraj@gmail.com

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