उस चौराहे पर – अज़ीज़ इमाम मदारी

उस चौराहेपर आजभी घना अँधेरा छाया है
क्या फिरसे कोई गुनाह हुआ है ?…
बेईमान और दरिंदी जिनकी काया है
क्या उनमे कोई सुलह हुआ है ?

एक अजीबसी ताकत, उंगली पकड़कर मुझे
उस चौराहेपर ले आयी I
ओह, बड़ाही भयानक नज़ारा है !
कहीं खुनके धब्बे,
तो कहीं टूटा हुआ भरोसा I
अगलेही पल मेरे हाथ, उसने कुछ हथियार रख दिये I
एक चाकू, एक तलवार और भरी हुयी एक बन्दूक ;
हाँ, वो सब थे बस मेरेही लिये !
फिर कहीं दुरसे एक आवाज़ आयी –
“तुझे इनकी जरूरत है भाई !”

एक एक कर जब टटोला सब लोगोंकों
मायुस हुआ दिल, ना पाकर किसीभी दुश्मनको I
फिर छुपाये उन हथियारोंकों अपने सीनेमें
मैं चल दिया एक सफरपे I
बड़ेही अजीबसे एक जंगलमे पहुँच गया मैं चलते चलते
कुछ कुछ दिखायी दिया, आँखोंकों मलते मलते I
खूबसूरत चीख उस लड़कीकी, मुझे बहका गयी
फटे कपड़ोंमेंसे चमक रहा था, बदन उसका खूनी
आंखोंसे निकली दो लकीरें उसकी, दिलकोभी मेरे दहला गयी II
सफ़ेद सोनेकी रस्सीको गलेसे अपने बांधकर
ना जाने वो किसान क्यों इतरा रहा है ?
यूं लगता है शायद, वो मेरी बेबसीपर हँसा जा रहा है II
दो लाशें अपने चीथड़ोंकों संभालते हुये
एक दूजेसे बिलग रहे हैं I
एक जलती ट्रेनमे मरा था और दूसरा बमके धमाकेसे
शायद ये बात वे भूल गए हैं !

आखिर हथियारोंनेही अपना शौर्यगीत सुना दिया
हर एकने अपनी मंज़िलको, अपने आपही पा लिया I
चीखना उसको छोड़ना था,
रस्सीको उसे तोड़ना था,
मासूमोंकोभी अब अमनके लिये, अपनोंसेही भिड़ना था !

एक बार फिर…… कहीं दुरसे आवाज़ आयी
“तुझेभी इनकी जरूरत है भाई, सवेरा ना होगा बिना लड़ाई !”
फिरसे आया मैं उसी चौराहेपर
दिलको बड़ी तबीयतसे घिसा, धार की उसको एक पत्थरपर
उड़ती चिंगारीयाँ देख, खिल गया चेहरा मेरा
थोड़ासाही सही . . .
पर चौराहेसे भाग रहा है अंधेरा !
हाँ, चौराहेसे भाग रहा है अंधेरा !!

Written by – अजीज इमाम मदारी 9890419778

This entry was posted in Members' Creations. Bookmark the permalink.