अशआर – धवल चोखडिया

शायर और लेखक

शायर और लेखक

अशआर – धवल चोखडिया


(1)

एक उम्र लुट के ले गया था कोई

ढूंढने पर पता चला वो वक्त था

 

(2)

हर किसी के अंदर एक दुनिया होती है

जहां गम और ख़ुशी का हिसाब होता है,

मत पूछो किसी से वो क्या सोच रहा है

गौर से पढो तो हर चेहरा जवाब देता है


(3)

अब कैसे कहूँ तुमको क्यूँ रहे हम उम्र भर अकेले

जज़्बात तो मेरे महंगे थे पर लोग बड़े सस्ते मिले


(4)

गुलाबो की महक है मेरी जिंदगी में

कांटो को गिनने की मेरी आदत नहीं,

हर किसी के वार को बखूबी जानता हूँ

पर बदला लेना मेरी फितरत में नहीं


(5)

आज फिर से शिकस्त खाई है मैंने

आज दुनिया को थोडा और समजा हूँ


(6)

सब कुछ तो लुटा हुआ है,

और क्या लुट के जाओगे?

ये घर तो उजड़ा हुआ है,

क्या वीरानिया ले जाओगे?

 

(7)

दिन को दिन, रात को रात कहता हूँ

मुझ पे जो गुज़री है वही बात कहता हूँ

 

(8)

राख में दबी हुई आग सब नहीं देख सकते

ये काम तुम एक शायर पर ही छोड़ दो

 

(9)

आवारगी तुझसे बस यही सिखा हूँ

मैं अपने घर में भी ठहरता नहीं हूँ

 

(10)

रिश्ता सब से रखो उम्मीद किसी से नहीं

फिर देख मज़ा जीने में आता है कि नहीं

  • धवल चोखाडिया
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