अब स्मृतियों में रहेगा गुरन बाबा का घूरना

कहते हैं कलाकार दिल के कमजोर होते हैं, और हो भी क्यों ना, उनका वास्ता भी दिल से ही तो ज्यादा पड़ता है । कई बार इनका दिल दगा करता है तो ऐसे ही चुपके से छोड़ कर निकल जाते हैं। कुछ इस तरह की पंक्तियां मेरे मानस पटल पर आ बैंठी, जब कल अचानक से अभिनेता राजेश विवेक के निधन का समाचार मुझे मिला।

राजेश विवेक जी

स्व. राजेश विवेक जी

राजेश विवेक भले ही कोई बड़े फिल्म स्टार नहीं हों पर सिनेमा के बुद्धिजीवी वर्ग में अपने अलहदा अभिनय के लिए खास पहचान रखते थे। अपनी शुरुआती फिल्मों में आँखों की पुतलियों को चढ़ाकर संवाद अदायगी करने के लिए खूब जाने जाते रहे। उनका पर्दे पर घूरते हुए आना, हर दर्शक के मन पर अपना असर छोड़ जाता था।

उनकी प्रारंभिक फिल्मों में उनके किरदार भुलाए नहीं भूलते हैं। रामसे ब्रदर्स की वीराना का वो बाबा जो ठाकुर खानदान की तबाही के लिए हवेली में नौकर बनकर रहने लगता है। या अनिल कपूर, सन्नी देओल स्टारर फिल्म जोशीले का दस्यु जोगी ठाकुर जिसने हीरो के बचपन पर अपनी क्रूरता की अमिट छाप छोड़ दी है। श्याम बेनेगेल की जुनून से अपने अभिनय की पारी शुरू करने वाले राजेश विवेक वो कलाकार थे जिनके क्रूर फिल्मी व्यक्तित्व ने मेरे मन पर भी दहशत की छाप छोड़ दी थी।  बचपन में एक पड़ोसी के VCR सेट पर चलने वाली वीराना कई बार देखी और जब जब राजेश विवेक पर्दे पर आते मैं बड़ी बहिन के पीछे छुप जाता था।  इसी कड़ी में बी आर चौपड़ा की महाभारत में वो वेदव्यास के चरित्र में दिखे। मुझे आज भी याद है भीष्म के आहवान पर वेदव्यास हस्तिनापुर आते हैं । उन्हें रानियों को गर्भ धारण कराना है, और इस  प्रक्रिया में उन्हें रानियों को घूरना है।  इस सीन में उन्होने किस तरह अपने आंखों से अभिनय कर जान डाल दी थी।

बाद में आशुतोष गोवारीकर की लगान के वक्त मैंने उन्हें वीराना और जोशीले के जोगी ठाकुर का रोल करने वाले कलाकार के रूप में ही पहचाना लेकिन स्वदेश के आते ही मैं उन्हें अभिनेता राजेश विवेक के नाम से जानने लगा था। स्वदेश में आशुतोष ने उनकी घनी दाढी मूंछों को हटाकर निरवाण नामक पोस्टमास्टर बना दिया।  अपनी प्रारंभिक फिल्मों में कई अच्छे किरदार निभाने के बाद बाद उनकी और कुछ फिल्में आई तो सही पर उनकी बहुत ज्यादा चर्चा नहीं हुई।

स्व. राजेश विवेक जी

फ़िल्म लगान के गुरन बाबा

2001 में आशुतोष गोवारीकर की लगान को उनकी दूसरी पारी के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि यहां भी वो धूलि धूसर व्यक्तित्व और बेतरतीब से बढती दाढी में दिखे। लेकिन ङ्क्षहदी सिनेमा के आम दर्शकों के लिए सकारात्मक भूमिका के कारण उनके फिल्मी स्वरूप का कायाकल्प हुआ।

आप देखते हैं कि लगान फिल्म में बैटिंग करने जाते समय उनमें अटूट लड़ने की इच्छा दिखती है। वो अपना बल्ला लहराते हुए जोर से बोलते हैं , आ फिरंगी आ ।

लगान में वे किसी खल चरित्र की बजाय नायक भुवन की टीम का हिस्सा थे जिसके ज्योतिष पर गंवार नायिका का अटूट विश्वास है। बाद में ऐसा ही अटूट विश्वास आशुतोष गोवारीकर और राजेश विवेक के बीच में भी रहा । जो लगान के बाद स्वदेश, व्हाट्सस योर राशि, जोधा अकबर और खेले हम जी जान से तक अटूट रहा। संभवत: वो आशुतोष की मोहनजोदड़ों में भी कोई ना कोई भूमिका जरूर निभा रहे होंगे।

फिल्म निर्देशक शेखर कपूर के साथ भी उनका रिश्ता नजदीक का रहा। शेखर कपूर के साथ जोशीले में खल चरित्र निभाने के वर्षो बाद एक बार फिर कपूर की बैंडिट क्वीन में भी चंबल के नामी दस्यु बाबा मुस्तकीम के रोल में नजर आए। बाबा मुस्तकीम ही वो दस्यु थे जिन्होंने ठाकुरों के जुल्मों का शिकार हुई  फूलन को संरक्षण दिया।

राजेश विवेक की फिल्मों की फेहरिश्त बहुत लंबी नहीं है, उन्होंने हमेशा चुनिंदा फिल्में की।  पिछले कुछ सालों में उनके दवारा अभिनीत कई विज्ञापन टेलीविजन पर नजर आते रहते हैं। उनकी अंतिम चर्चित फिल्मों में सन ऑफ सरदार और अगिनपथ रही जिनमें दर्शकों ने उन्हें नोटिस किया।

सिनेप्रेमियों को याद होगा करण मल्होत्रा की अगिनपथ में पुलिस इंस्पेंक्टर मिं बक्शी जिसे विजय दीनानाथ चौहान बने रितिक वैन के ऊपर बांधकर खुफिया जानकारी पाने के लिए परेशान करते हैं।

राजेश विवेक का यूं असमय निधन, ना केवल फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हर व्यक्ति को बल्कि उनके किरदारों पे शैदाई सिनेदर्शकों को भी तगड़ा झटका दे गया।

द्वारा – धर्मेंद्र उपाध्याय

धर्मेन्द्र उपाध्याय

धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। . 

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