स्क्रीनराइटर्स असोसिएशन के सेमिनार में लिखी गई भोजपुरी फिल्मों के बदलाव की कहानी!

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“भोजपुरी बेहद मीठी भाषा है. देश के बड़े बड़े साहित्यकारों और क्रांतिकारियों की भाषा है, लेकिन ऐसी महान भाषा का सिनेमा इतनी बुरी हालत में है ये सोचकर भी शर्म आती है.”

यह कहना था हिन्दी फिल्मों के प्रख्यात लेखक कमलेश पांडे का. वह स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘भोजपुरी सिनेमा : कल, आज और कल’ में बतौर अतिथि बोल रहे थे. कमलेश पांडे खुद भी भोजपुरी भाषी हैं.

अंधेरी पश्चिम के भक्तिवेदांत स्कूल ऑडिटोरियम में आयोजित प्रोग्राम में भोजपुरी सिनेमा के मौजूदा हालात और भविष्य की संभावनाओं को लेकर स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन ने चर्चा आयोजित की थी. चर्चा दो सत्रों में हुई. पहले सत्र में भोजपुरी फिल्मों की स्क्रिप्ट को लेकर बात हुई, जबकि दूसरे सत्र में भोजपुरी फिल्मों के गीतों पर बहस हुई.

पहले सत्र में लेखक जीतेन्द्र सुमन, निर्माता–वितरक अभय सिन्हा, अभिनेता कुणाल सिंह, अभिनेत्री स्वीटी छाबड़ा और लेखक-निर्देशक मंजुल ठाकुर पैनलिस्ट थें. जबकि मॉडरेटर थे भोजपुरी फिल्मों के लेखक धनंजय कुमार. इस सत्र में भोजपुरी फिल्मों की स्क्रिप्ट की कमजोरी पर बात हुई. निर्देशक मंजुल ठाकुर ने जहाँ अच्छे स्क्रिप्ट राइटर के न होने की बात उठाई, वहीं राइटर जीतेन्द्र सुमन का कहना था कि अच्छे स्क्रिप्ट राइटर्स तक लोग पहुँचते ही नहीं, क्योंकि उन्हें कम पैसे में राइटर चाहिए. जबकि निर्माता अभय सिन्हा का कहना था कि राइटर्स को हमने पाँच पाँच लाख तक पेमेंट किया है, लेकिन अच्छी भोजपुरी फिल्में चल नहीं पातीं. तो अभिनेता कुणाल सिंह और हीरोइन स्वीटी छाबड़ा का कहना था कि राइटर के यहाँ से चली स्क्रिप्ट सेट पर आर्टिस्ट तक आते आते काफी बदल जाती है.

कई भोजपुरी फिल्मों में हीरोइन रहीं स्वीटी छाबड़ा ने यह भी स्वीकार किया कि भोजपुरी फिल्मों की हीरोइन के तौर पर खुद का परिचय देते वक्त परिवारों में कई बार झेंप सी होती है. वहीं अभय सिन्हा ने कहा कि जो रेगुलर प्रोड्यूसर फिल्में बना रहे हैं, उनकी फिल्मों में फूहड़ता नहीं होती. लेकिन ढेर सारे नये प्रोड्यूसर भी फिल्में बनाने आते हैं, उनकी फिल्मों की वजह से हम सब भी बदनाम हो जाते हैं. इस सत्र की पूरी चर्चा में यह बात उभर कर आई प्रोड्यूसर्स चूँकि स्क्रिप्ट राइटर पर अपने बजट से नहीं के बराबर राशि खर्च करना चाहते हैं, इसलिए अच्छे स्किल्ड स्क्रिप्ट राइटर भोजपुरी फिल्मों के लिए स्क्रिप्ट नहीं लिखते, इसलिए स्तरीय और अच्छी फिल्में नहीं बन पातीं.

दूसरे सत्र में गीतों को लेकर चर्चा हुई. इस सत्र में पैनलिस्ट के तौर पर गीतकार समीर, लोकगीत गायिका शैलेश श्रीवास्तव, निर्देशक सुनील प्रसाद, राजकुमार पांडे, वर्ल्ड वाइड रिकॉर्ड्स के मालिक रत्नाकर और उत्तरप्रदेश फिल्म विकास परिषद के वाइस प्रेसिडेंट गौरव द्विवेदी शामिल हुए. मॉडरेटर थे धनंजय कुमार.

इस सत्र में राजकुमार पांडे और म्यूजिक कम्पनी मालिक को जहाँ डबल मीनिंग गानों के लिए कटघरे में खड़ा किया गया, वहीं समीर ने कहा कि अब यह दौर भी अपने आखिरी चरण में हैं. जितनी नंगई भोजपुरी फिल्मों में है, उसके आगे अब कोई शब्द नहीं बचे. अगर यह ट्रेंड नहीं बदला तो भोजपुरी फिल्में एक बार फिर बंद होने की स्थिति में पहुँच जायेंगी. सुनील प्रसाद और शैलेश श्रीवास्तव ने भोजपुरी लोकगीतों की मिठास और पुरानी फिल्मों के गानों की कर्णप्रियता को याद किया तो, रत्नाकर का कहना था बुरे गानों का दौर खात्मे की ओर है और वह अपनी कम्पनी से ऎसे गाने रिलीज नहीं करते. अभिनेत्री स्वीटी छाबड़ा का कहना था कि उन्होंने कभी वल्गर गानों पर काम करना स्वीकार नहीं किया. इस स्थिति से उबरने में उत्तरप्रदेश फिल्म विकास किस तरह अपनी सकारात्मक भूमिका निभा सकता है, इस पर अपनी बात रखते हुए वाइस प्रेसिडेंट ने कहा कि अच्छी फिल्म बने इसके लिए उत्तर प्रदेश फिल्म विकास परिषद वचनबद्ध है और हम हर सम्भव मदद को तैयार हैं.

प्रोग्राम की शुरुआत स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन द्वारा भोजपुरी फिल्मों के अब तक के सफर पर बनाई गई डॉक्यूमेंटरी फिल्म के प्रदर्शन से हुई. डॉक्यूमेंटरी फिल्म की संकल्पना और स्क्रिप्ट धनंजय कुमार की थी, जबकि निर्देशन किया था सुनील प्रसाद ने.

उसके बाद एसोसिएशन के महासचिव ज़मा हबीब ने राइटर्स एसोसिएशन के द्वारा इस तरह के प्रोग्राम के पीछे के मकसद को सामने रखा और भोजपुरी फिल्मों के गानों से जुड़ी अपनी पसंद–नापसंद की चर्चा की. महासचिव के वक्तव्य के बाद एसोसिएशन के वाइस प्रेसिडेंट और इवेंट सब-कमिटी के चेयरमैन दानिश जावेद ने आज के कार्यक्रम के बारे में संक्षिप्त परिचय दिया. प्रोग्राम के उद्घोषक थे सुधाकर स्नेह. इस अवसर पर हिन्दी के प्रख्यात लेखक अंजुम रजाबली, विनय शुक्ला, जलीस शरवानी, टेलीविजन सीरियल लेखक राजेश दुबे, सुनील साल्गिया, शांति भूषण, मनोज हंसराज, के मनोज सिंह और अमित झा सहित ढाई सौ से अधिक भोजपुरी सिनेमा से जुड़े लेखक, निर्देशक और भोजपुरी भाषा प्रेमी उपस्थित थे.

समारोह का फ़ोटो एल्बम देखने के लिए क्लिक करें: https://www.facebook.com/pg/filmwritersassociation/photos/?tab=album&album_id=1258212917566809

देखें, समारोह में दिखायी गयी डॉक्यूमेंट्री ‘भोजपुरी सिनेमा: कल आज और कल’ – 

 

 

 

 

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SCREENWRITING WORKSHOP BY ANJUM RAJABALI

Whistling Woods International & Screenwriters Association

Present

SCREENWRITING WORKSHOP

By Anjum Rajabali  

With – Jaideep Sahni (Chak De India)  Shakun Batra (Kapoor & Sons)

Nitesh Tiwari (Dangal) (TBC)   Gauri Shinde (Dear Zindagi)

Juhi Chaturvedi (Piku)  Ashwiny Iyer Tiwari (Nil Battey Sannata)

Sriram Raghavan (Badlapur) Shridhar Raghavan (Dum Maro Dum)

Nikhil Mehrotra (Dangal) Shreyas Jain (Dangal)

March 1-5, 2017   |   At Whistling Woods International, Mumbai.

2016 can be called the year of the Indian screenwriter! With a slew of films powered by some scintillating scripts blazing new trails, the scramble for good scripts gets a shot in the arm. Writers’ visions seem to be driving storytelling in the Hindi film industry.

Those who were part of this trail-blazing year are happy to share their knowledge, experience and guidance, via interactive masterclasses in the workshop!

With the aid of new examples, references and illustrations, the Workshop Instructor will cover all the useful principles of screenwriting, the navrasa theory, Indian mythology, copyright law, writers’ contracts, and offer professional guidance.

WORKSHOP INSTRUCTOR

Anjum Rajabali

Anjum Rajabali

Anjum Rajabali (Drohkaal, Ghulam, The Legend of Bhagat Singh, Raajneeti): Head of Screenwriting at Whistling Woods, erstwhile honorary head of Screenplay Writing at FTII, and an activist of SWA. Conducts workshops, script labs, seminars and fellowships for screenwriters in India and abroad.

FEE: For SWA members: Rs. 8500/- (Inclusive of taxes, tea/coffee and lunch on all days) For non-SWA members: Rs. 11000/- (Inclusive of taxes, tea/coffee and lunch on all days)

*If you wish to become an SWA member, please visit www.fwa.co.in

Facebook Event Page: www.facebook.com/events/695328800627552/  

For more information and to register for the workshop, please call 30916003 or email: kanchi.parikh@whistlingwoods.net

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SWA stands in solidarity with Writers Guilds of America (West and East)

The Screenwriters Association (SWA) of India expresses its shock and outrage at the recent policy announcement by the new President of America, imposing barriers on the entry of people from other countries, which is clearly a thinly disguised ‘Anti-Muslim’ ban. Discriminating against people on the basis of the country, religion or region that they were born into amounts to a violation of their natural freedom of movement and hence of their human rights.

Such xenophobic policies create and reinforce suspicion and hate among peoples, thereby legitimating prejudice and even inciting violence by demonizing certain communities and nationalities.

SWA stands in solidarity with their brother unions – the Writers Guilds of America (West and East) and their screenwriting members – which have issued the following statement protesting and opposing the ban policies:

 

 

Writers Guilds America (East & WesT)

Writers Guilds Statement on Muslim Ban;     

Solidarity with Iranian Filmmaker Asghar Farhadi

New York and Los Angeles (January 29, 2017)

The following is a joint statement from Michael Winship, President, Writers Guild of America East (WGAE), and Howard A. Rodman, President, Writers Guild of America West (WGAW):

“It is both unconstitutional and deeply wrong to say that you cannot enter our country because of where you were born or what religion you were born into.  The Writers Guilds of America, East and West condemn Donald Trump’s profoundly un-American “Muslim ban,” and applaud the Federal Court’s decision to grant a stay that will keep those being held at American airports from being forcibly returned to their countries.  Human rights – including the freedoms of speech and religion – are essential to all Americans and to all who come here to build better lives.

“We are especially troubled by reports that Asghar Farhadi, director of THE SALESMAN, which won Best Screenplay at Cannes and is now nominated for an Oscar, may together with his cast and crew be prevented from entering our country.  From its early days, the entertainment industry has been built by the imagination of immigrants.  Our guilds are unions of storytellers who have always welcomed those from other nations, and of varying beliefs, who wish to share their creativity with America.  We are grateful to them, we stand with them, we will fight for them.”

(For more information on the Writers Guild of America, East, visit www.wgaeast.org.     For more information on the Writers Guild of America, West, visit www.wga.org.)

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भोजपुरी सिनेमा : कल, आज और कल

स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन द्वारा आयोजित

भोजपुरी सिनेमा : कल, आज और कल

भोजपुरी सिनेमा के हालात और संभावना पर एक विहंगम विमर्श !

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12 फ़रवरी 2017, 3.00 बजे से 7.00 बजे तक

स्थल: भक्तिवेदांत स्कूल ऑडिटोरियम (सिटी मॉल के पीछे वाली सड़क पर), ऑफ लिंक रोड, अंधेरी (पश्चिम), मुम्बई.

आप भी पधारिये!

भोजपुरी फिल्मों के बारे में चाहे जो भी बोलिए, उसे कितना ही वल्गर और फूहड़ बतलाइये, समाज और संस्कृति का बंटाधार करने का आरोप लगाइये, लेकिन यह सच है कि भोजपुरी फिल्में अपना बाजार गढ़ चुकी हैं. बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश की बात छोड़िये, मुम्बई महानगर में दस से अधिक ऎसे सिनेमाघर हैं, जो सिर्फ भोजपुरी फिल्में ही रिलीज करते हैं. हर साल 60 से 70 फिल्में बन रही हैं. ढेर सारे कलाकारों, तकनीशियनों और सिनेमा से जुड़े लोगों को रोजगार दे रही हैं. और जो सबसे महत्वपूर्ण है, वह यह कि अगर भोजपुरी फिल्में नहीं होतीं, तो बिहार के लगभग सिनेमाघर बंद हो चुके होते. याद कीजिए, 1995 से 2005 तक का वक्त, जब बिहार में हिंदी फिल्मों का बाजार लगभग मृतप्राय हो गया था. राज्य में अपराधियों का बोलवाला हुआ करता था और शाम पाँच बजे के बाद सड़क पर निकलना लोग पसंद नहीं करते थे. सिनेमाघर के शाम 6 बजे और रात 9 बजे के शो तो लगभग खाली रहा करते ही थे, नून शो और मैटिनी शो में भी परिवार आना पसंद नहीं करता था. कभी हिंदी फिल्मों को सबसे ऊँचे भाव देने वाली टेरेटरी बिहार में हिंदी फिल्मों का धंधा लगभग नहीं के बराबर हो गया था. कई डिस्ट्रीब्यूटर्स बर्बाद हो गये और उन्होंने अपना बिजनेस समेट लिया था. कई सिनेमाहॉल कोल्डस्टोर में बदल गये. ऎसे में भोजपुरी फिल्मों ने संजीवनी का काम किया. हमें यह भी याद रखना होगा.

लेकिन हम भोजपुरी लेखकों, फिल्मकारों, कलाकारों और तकनीशियनों को अब यह भी सोचना होगा कि हम जहाँ आ खड़े हुए हैं, वहाँ से रास्ता कहीं आगे बढ़ता है या हम वही गोल गोल घूम कर एक बार फिर खत्म हो जाने को अभिशप्त हैं. क्योंकि 2005 के बाद साल दर साल बिहार का माहौल बदला है. आम आदमी नाइट शो देखने में हिचक नहीं रहा है. यही वजह है कि हिंदी फिल्मों का बाजार एक बार फिर बिहार में जमने लगा है. लेकिन भोजपुरी फिल्मों का बाजार सिमटने लगा है. जो सिनेमाहॉल पहले भोजपुरी फिल्में रिलीज करने की आपाधापी में रहते थे, अब भोजपुरी फिल्में रिलीज करने से बचना चाहते हैं. उनका कहना है कि भोजपुरी फिल्मों की वजह से फैमिली सिनेमाघर आना पसंद नहीं करती. समोसा और कोल्ड ड्रिंक्स बेचनेवाला भी नहीं चाहता कि भोजपुरी फिल्में रिलीज हो, क्योंकि उनके बिजनेस पर भारी अंतर पड़ जाता है. और इसकी वजह है भोजपुरी फिल्मों का लो क्वालिटी का होना, डबल मीनिंग संवादों और गीतों से लवरेज होना. ऎसे में भोजपुरी से जुड़े लेखकों, फिल्मकारों और तकनीशियनों को सोचना होगा कि हमारी फिल्में अपनी लो क्वालिटी या कहें फूहड़ता से कैसे उबरें. और इसके लिए हमें सोचने की जरूरत है कि हम वैसी फिल्में कैसे बनायें, ताकि लोअरक्लास के साथ साथ मिड्लक्लास भी हमारी फिल्में देखने आये. शहर के सबसे खराब सिनेमाहॉल में रिलीज होने की जगह राजधानी और शहर के गौरव सिनेमाघर में कैसे रिलीज हो सके. इससे हमारी फिल्मों की कमाई भी बढ़ेगी और हमारा स्तर भी सुधरेगा.

इन्हीं सब परिस्थितियों और मसलों पर बात विमर्श करने के लिए आगामी 12 फरवरी को अंधेरी लोखंडवाला [सिटी मॉल के पीछे वाली सड़क पर] के भक्ति वेदांत स्कूल के ऑडिटोरियम में स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन ‘भोजपुरी सिनेमा : कल आज और कल’ नाम से एक प्रोग्राम करने जा रहा है. प्रोग्राम में भोजपुरी फिल्मों से जुड़े लेखक, गीतकार, कलाकार, निर्माता, निर्देशक, डिस्ट्रीब्यूटर, म्यूजिक कंपनी के मालिक और दर्शक एक छत के नीचे जमा होंगे. आप भी आइये. समय है 3 बजे से 7 बजे तक.

(नोट: कार्यक्रम में सभी एसडब्ल्यूए मेंबर्स और नॉन-मेंबर्स आमंत्रित हैं! बैठने की व्यवस्था ‘पहले आओ-पहले पाओ’ के आधार पर रहेगी।)

Event Page: https://www.facebook.com/events/293624487707098/

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Rest In Peace, NAQSH LYALLPURI Saab!

Naqsh Lyallpuri _ Chautha

NaqshLyallpuri

Naqsh Lyallpuri  (Feb 24, 1928 – Jan 22, 2017)

One of SWA’s founder members, Ex-Treasurer and senior-most lyricists, Shri Naqsh Lyallpuri passed away on Sunday, January 22nd, 2017. Naqsh saab, whose real name was Jaswant Rai Sharma, had been ailing for some time and breathed his last around 11 a.m. at his Andheri house. He was 89.

Lyallpuri had come to Mumbai in late 1940’s from a district named Lyallpur (today known as Faisalabad, Pakistan). He later adopted the pen name ‘Naqsh’ and added ‘Lyallpuri’ to it, as per the tradition of Urdu poets adopting their hometown’s name. He got his first break in 1952 as a lyricist and by 1970’s, was collaborating with top film directors, music directors and singers, penning melodies which went on to become evergreen songs. Some of his most popular songs include: Dhani Chunri Mori Haay Re, Main Toh Har Mod Par Tujhko Doonga Sada, Ulfat Mein Zamaane Ki Har Rasm Ko Thukrao and Chandni Raat Mein Ek Baar Tujhe Dekha Hai.

Lyallpuri had retired from the industry in the late 1990s before he made a brief comeback in 2005-06 penning songs for the films Taj Mahal (music: Naushad) and Yatra (music: Khayyam). He will be remembered not only as a genius Urdu poet but also a cultured, soft-spoken gentleman whose words, penned or otherwise, always struck the right chord.

Screenwriters Association deeply mourns the sudden and sad demise of Naqsh saab and prays for his soul to rest in peace.

Watch/read Naqsh Lyallpuri’s last ever interview in our ‘Old is Gold’ archives, here: http://fwa.co.in/ogtemplate.php?get=FWAoig5

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Here’s why Henrik Ibsen’s A Doll’s House touched my heart!

Henrik Ibsen’s ‘A Doll’s House’

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It is Christmas Eve and the doll has told maids to hide the Christmas tree from the children until it is decorated and lighted up, and she is going to dress up and perform the Tarantella in the party as it is her master’s wish. On the day after Christmas she will leave, changed forever, no longer a doll, but as Nora, Henrik Ibsen’s Nora.

At the time when the play A Doll’s House was written, marriages were sacrosanct, women were meant only to look after their husband, children and the house, in return the husband was to provide her with everything that she needed for maintenance; a rich man was a good prospect of making a happy married life.

Nora – managing the Helmer House and all the maids, taking care of her three little children, jumping around like a squirrel for her husband, Torvald Helmer – is struck by a calamity and there is no one on her side to support her, not even her master, Torvald. When the time approaches for the miracle Nora very much hoped and dreaded for to happen, she is left with absolutely nothing in her life.

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Henrik Ibsen

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From the year 1879 when A Doll’s House was performed for the first time on the stage to the modern 21st century, this play has continued to be appreciated both by the academia and the audience. Free from the in-style verbose poetical soliloquies and with the woman as the central character, it was both a pioneering and a controversial play; pioneering for bringing the element of realistic drama in the theatre world which till then had been occupied with the historical romance and the thesis plays, and controversial for a woman behaving the way Nora did was unheard of, which is why Ibsen, on one occasion, had to present a leading actress with an alternate ending as she refused to act in the play as a woman who abandons her husband and children.

Many playwrights have also criticised the sudden awakening that Nora undergoes, which then gives her the strength to walk out; the Swedish playwright, August Strindberg, questioned Nora’s decision to leave her children with a man whom she doesn’t trust any more.

But, with or without any flaws, Nora’s story has touched many hearts and has made it a timeless piece of work. Its simplicity, conversational tone and ‘the slamming of the door’ climax gives us a truly dramatic, cathartic and a classic three act play. If the change of heart that Nora’s character goes through in the third act is unacceptable and absurd, then it only magnifies the fact that A Doll’s House is an absolutely realistic work because reality is stranger than fiction.

The storyline moves and grows and evolves and complexes with every scene. Nora, shifted from her father’s doll’s house to her husband’s, from past eight years had been working to decorate it. She, Torvald’s little lark, little spendthrift, knows nothing but to be at her husband’s disposal, by thoughtless choice of course. Ivar, Emmy and Bob are Nora’s dolls with whom she happily plays and she is Torvald’s doll, whom she happily obeys.

Nora (goes to the table on the right): I shouldn’t think of doing what yon disapprove of.

Helmer: No, I’m sure of that; and, besides, you’ve given me your word. (Going towards her) Well, keep your little Christmas secrets to yourself, Nora darling. The Christmas-tree will bring them all to light, I dare say.

Uninformed and an act of love becomes unreasonable and an act of forgery for Nora Helmer; she took loan to save her sick husband and forged the documents because that was the only way out. Later when Krogstad present her with the facts, Nora replies,

“Do you mean to tell me that a daughter has no right to spare her dying father anxiety? That a wife has no right to save her husband’s life? I don’t know much about the law, but I’m sure that, somewhere or another, you will find that that is allowed.”

Krogstad is determined to reveal her secret and Nora is worried only for Torvald as she is sure he will take the blame for her sake and spare her any shaming. This is her fear for she knows Torvald would do anything in the world for her safety. What happens, though, is the stark opposite of this; Trovald is only worried about his own reputation and is even ready to bow and accept Krogstad’s demands. When Krogstad sends the IOU and apologies for troubling Nora, Trovald changes euphorically and assures Nora that everything is fine.

But nothing is fine for Nora as she finally sees herself; Torvald becomes a mirror for her and the quick personality shifts he presents her with, shatters the mirror altogether and a real view of things comes in forefront. Nora starts to question – question her life, her relationship with Torvald, her role as a mother, her understanding of what society teaches and what she wishes to learn. Torvald’s little lark realises that she can fly and she, thus, chooses to do so.

Helmer: Nora, can I never be more than a stranger to you?

Nora (Taking her travelling bag): Oh, Torvald, then the miracle of miracles would have to happen.

Helmer: What is the miracle of miracles?

Nora: Both of us would have to change so that… Oh, Torvald, I no longer believe in miracles.

Helmer: But I will believe. We must so change that…?

Nora: That communion between us shall be a marriage. Goodbye.

With A Doll’s House Ibsen had no intention to serve the women’s rights movement, rather it was to present the significance of individual responsibility, the importance of understanding oneself, ones’ purpose in life and then striving to achieve it.

By the end Nora is ready to take a stand for herself, without any fear of the society or her master, without her own fears and inhibitions, without any support, but only with a determined and awakened mind, heart to know about herself and her life. And this certainly is why A Doll’s House still charms its readers, after all, the field of studying oneself is not well explored and many discoveries, many inventions are yet to be made.

 

-Jagriti Thakur

(A writer and SWA member who believes in and practices the art of perpetual storytelling. Reach her at jagriti.thakur5@gmail.com )

 

 

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Screenwriting Workshop with Ron Osborn

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Rest In Peace, OM PURI Ji!

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The world will remember him as one of the most naturally gifted actors ever. Many will remember him for his warm earthiness and rustic Punjabi humour. A few will remember him for his down-to-earth attitude and the genuine camaraderie he enjoyed with like-minded people such as the senior Puri (Amrishji – no relation) Naseeruddin Shah, Gulshan Grover and others. Fewer still will remember him for the terrific mimic and prankster he was.

Somewhere today, my former Army driver Sethu will be recalling the day when he stood mouth agape, in total shock, as Omji nimbly hopped into our car, even though the film unit had sent a car for him. This was during the shooting of ‘China Gate’ in Hyderabad; the deal was that I travel with him to the location and continue the interview in the car. However, the minute I pulled up outside the hotel in an Army car, Omji ne na daayan dekha na baayan, bas, he got into our car as it had been his dearest wish once upon a time to join the Indian Army. Needless to say, the drive was more of a trip down memory lane and the interview was pushed aside for later. On location, he and Amrishji kept me in splits and both took it in turns to do my khaatirdaari when the other was called for the shot.

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Somewhere today, my maami (aunt’s) sister will be recalling the time I stayed with her in London. I was attending the World Travel Mart and when I came back home one evening, she said: “Some Om had called for you.” Omji knew that I was in London; he himself was shooting in Wales at the time and had taken it upon himself to check train timings so I could travel down; “Yaar, six bedroom ka cottage diya hai unit waalon ne, bore ho raha hoon, aaja, gappe lagate hain!” I was in splits as I told Lubna aunty it was Om Puri whom she had spoken to. “Hain? Om Puri? The actor??” She literally begged me to let her speak to him so when I called him back, I requested him to say a quick “hi” to her and he generously obliged, indeed, he floored her with his warmth.

And somewhere today, I have been thinking that I spoke to the man just three days ago. He had the flu and his voice sounded heavy with the cold and so we discussed meeting next time either when he was in Bangkok or when I was back in Bombay. If anything, this incident has brought home to me sharply that there are no “next times” – the time that we know is the here and now.

His former wife, Nandita, had written a controversial book on him, but I was surprised to see that she had skipped over much of the early years and the harsh childhood that went into shaping his indomitable spirit. His parents were quite poor and therefore he was being brought up by his uncle and aunt in the village. One day his father and uncle had a fight, as a result of which Omji was made to leave the house. He hid out in the outbuildings and his school friends would steal raw vegetables from their farms and bring him, which the young Om (he was in the 4th Std, so about 9-10 years old then) would attempt to cook. By the time he was in the 5th Std, he was giving tuitions to other children to make ends meet for himself. Omji was very keen to join the Indian Army and even went to the Recruitment Centre at Ambala, however, the Recruiting Officer asked for bribe money which of course, he didn’t have and a disgusted, disillusioned Om turned back – but he never lost his love of all things Army. Much later in his life, when his only child Ishaan was born, he was diagnosed with partial blindness and Omji told me once that he was taking on any role that came his way simply because he had to earn lots of money; there was only one Chinese doctor in Boston who could perform this surgery and this was Omji’s goal.

This is a man who rose above his physical shortcomings and socio-economic background, to win laurels such as the Padma Shri and the OBE, to gain recognition both in the east and the west. Om Puri will be remembered by many for the deeply sensitive, versatile actor that he was and the hard hitting performances that he gave. But some will remember him for the true friend that he was and for the humour and humility that stayed with him no matter how many pinnacles he climbed. If someone can say this about me in my obituary, it will have been a life well worth lived.

– Punam Mohandas

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ओमपुरी- संघर्ष की सतत यात्रा का बेसुरा विराम!

यूं तो मैं बचपन से ही ओमपुरी का प्रशंसक रहा पर मेरा ये दुर्भाग्य रहा कि जब मेरी उनसे मुलाकात हुई तब वे अपनी पत्नी नंदिता के साथ अपने रिश्ते को लेकर कशमकश में थें। उनके टूटते रिश्ते को लेकर समाचार चैनल बड़ी खबरें चला रहे थे, लेकिन मुझसे उनका मिलना शायद मजबूरी थी क्योंकि जयपुर में आयोजित कार्यक्रम उस सीमेंट कंपनी द्वारा आयोजित किया गया था, जिसके वे कुछ समय से ब्रांड एबेंसडर थे। ऐसे में उनका प्रेस रिपोटर्स से रूबरू होना मानो एक पीड़ा का सबब था।

मुझे आज भी याद है वो दिन जब ओम पूरे इंटरव्यू के दौरान आंखें चुरा रहे थे मानो उन्हें डर हो कि मैं कहीं उनसे नंदिता और उनकी टूटती घर गृहस्थी को लेकर कोई सवाल ना कर बैठूं। मैं उनकी पीड़ा को ताड़ गया और मैंने इस बात को लेकर उनसे कोई सवाल नहीं किया। हालांकि दूसरे दिन मेरे पास अपनी न्यूज़ स्टोरी का सनसनी खेज शीर्षक नहीं था और इसे लेकर मेरे सिनेप्रेमी चीफ रिपोर्टर भी मुझसे थोड़े खफा थे । लेकिन आज ओमपुरी जब हमारे बीच नहीं रहे तब गहरी वेदना के बीच मुझे उस दिन की अकर्मण्यता पर खुशी हो रही है।

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ओमपुरी नामक अभिनेता जिसे संघर्ष का दूसरा नाम कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। ओमपुरी के पंजाब में बिताएं बचपन और किशोरवय के बाद के संघर्ष को दरकिनार कर दिल्ली राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की बात करूं तो यहां भी उन्हें बेहतर अभिनेता होने के बावजूद सैकंड लीड रोल मिलें । नाट्य विद्यालय के तत्कालीन निदेशक इब्राहीम अल्काजी नसीरूद्दीन शाह को प्रमुख रोल दिया करते थे। एक बार जब नसीर नाटक में प्रमुख भूमिका निभाने में असमर्थ थे तो अल्काजी ने दूसरे छात्र सतपाल को प्रमुख रोल देने की बात कहीं तो उन्होंने पूरी क्लास के सामने इस बात का विरोध किया क्योंकि उन्हें विश्वास था कि वो किसी भी मामले में सतपाल से कमतर नहीं हैं।

उनके भद्दे से दिखने वाले चेहरे को लेकर हिंदी फिल्म इडंस्ट्री की मुखयधारा से जुड़े लगों ने चाहे कुछ भी कहा हो पर उनके बेजोड़ अभिनय का लोहा सबने माना। ओमपुरी के मुंबई में शुरूआती दिनों में मरहूम हास्य अभिनेता महमूद ने कहा था कि यार इंडस्ट्री में एक नया अभिनेता आया है जिसके चेहरे के गडढों को एक किलो गोस्त के कीमे से भी नहीं भरा जा सजा सकता है, और बोलता है तो उसकी आवाज ऐसी लगती है जैसे छलनी में कंकड़ छाने जा रहे हों पर जालिम अभिनय ऐसा करता है कि उसे पर्दे पे देख कलेजा मुंह को आता है।

लेकिन उनके जीवन वृत को देख ताज्जुब होता है कि जिसने अपने समय में दुनियां के तमाम विरोध के बाद भी अपने हुनर का लोहा मनवा लिया वो इंसान अपने प्यार और परिवार के समक्ष इतना कमजोर साबित हुआ।

सीमा कपूर से उनकी शादी भी एक हादसे के समान साबित हुई ।

इस क्षणिक से रिश्ते को लेकर सीमा कपूर को इस बात की तसल्ली थी कि उन्होंने उस इंसान से शादी की हैं जिसे वो इंडस्ट्री हाथों हाथ ले रही है जिसमें वो अपनी असीम खूबसूरती के बाद भी अच्छा सा स्थान नहीं बना पाईं वहीं सीमा कपूर के तल्ख लहजे के कारण ओमपुरी ने भी कहीं ना कहीं सीमा कपूर को भी अपने मानसपटल पर उन ट्रोफियों की संज्ञा दे दी जो उन्होंने अपने हुनर के दम पर जीतीं थी।

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उनकी दूसरी पत्नी पत्रकार नंदिता जो कोलकाता में उन्हें सिटी ऑफ जॉय की शूटिंग के दौराना मिली। सीमा कपूर से उनकी शादी की तुलना में ये रिश्ता काफी समय चला लेकिन इस रिश्ते में तल्खी तब आई जब उन्हें सबसे ज्यादा इस रिश्ते की जरूरत थी। उन्हें पिछले कुछ सालों से इस बात की पीड़ा भी थी कि उनकी पत्नी सबसे गाहे बगाहे उनके मासूम बेटे की नजरों में उन्हें बड़ा विलेन साबित करने पर जुटी हुई थी, उनकी मौत के बाद सवाल ये भी आता है कि अब सीमा कपूर को क्या आन पड़ी थी जो वे दोबारा से ओम पुरी के संपर्क में आई और नंदिता से उनका गर्भनाल सा कच्चा पड़ा रिश्ता अंतत: कट गया।

मुझे ये तो नहीं पता कि उन्हें दिल का दौरा पड़ने की वजह, कौन सा एसा समाचार था जो उनके कान में पड़ा जिसे सुनकर वे विचलित हुए होंगे पर उनका ये पूरा देश जानता है कि उनका अंतिम समय शांति सुकून से दूर रहा। अपने आसपास के माहौल से विदीर्ण होकर वे शराबनोशी के आगोश में समा गए।

कुछ समय पहले ऐसे माहौल में ही उनसे फौजियों के लेकर कुछ अटपटा निकल गया तो पूरे देश ने उन्हें आड़े हाथ लिया। दूसरे दिन ही उन पर कौनसा ऐसा दबाब पड़ा कि वे फौजियों के जूतों के आगे नाक रिगड़ने की बात करने लगे। मुझे तो उस समय उनके कंपकंपाते शरीर को लेकर ही मन में डर की एक लहर उत्पन्न हो गई थई। और इस डरा का पटाक्षेप आज सुबह हो ही गया जब मैंने ये खबर सुनी कि अभिनेता ओम पुरी नहीं रहे। … ओम सर भले आप शरीर से हमारे साथ नहीं रहे हों पर अपने काम के जरिए आप दशकों तक आने वाली पीढियों के दिल में मौजूद रहें। । .. सादर नमन!

 

– धर्मेंद्र उपाध्याय

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SWA Members win First Prize at International Competition

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SWA’s Script Library

SWA is planning to build a Script Library – Online on our Website and Offline in the office library; as learning reference for our members. This is a humble appeal to all our esteemed successful Scriptwriter Members who have had their scripts made into films to contribute their film scripts to our Library.  We believe this will be in larger interest of our profession and a big help to budding / struggling writer members understand the art and craft better.. This initiative is purely for academic purpose and contributing members will continue to hold all the copyrights and other rights.

You may send your scripts to editor.fwa.co.in@gmail.com
We can arrange to pick-up the scripts from your place if they are hardcopies.

If you have any queries kindly write to us on the same Email id or call on 9022107700.

We will be glad to cover your interview / articles / special writing experiences / research regarding the scripts, should you wish to share them.

Thank you very much.

SWA Website Committee

PLEASE NOTE WE ARE ONLY LOOKING FOR SCRIPTS WHICH HAVE BEEN FILMED AND RELEASED. DON’T SEND OTHER SCRIPTS / SCRIPTS FOR READING / SEEKING WORK LEADS.

 

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